जो अभी तक भूमि पर अचेतसी पड़ी थी सहसा उठी और अपनी पिरय पुत्री को छाती से लगा लिया। यह उसका अन्तिम नैराश्यपूर्ण आलिंगन था। पतिवंचित मातृहृदय के लिए संसार में कोई अवलम्ब न था। पॉलिक्सेना ने धीरेसे माता के हाथों से अपने को छुड़ा लिया, मानो उससे कह रही थी- 'माता, धैर्य से काम लो ! अपने स्वामी की आत्मा को दुखी मत करो। ऐसा क्यों करती हो कि यह लोग निदर्यता से जमीन पर गिरकर मुझे अलग कर लें ?'
थायस का मुखचन्द्र इस शोकावस्था में और भी मधुर हो गया था,
जो अभी तक भूमि पर अचेतसी पड़ी थी सहसा उठी और अपनी पिरय पुत्री को छाती से लगा लिया। यह उसका अन्तिम नैराश्यपूर्ण आलिंगन था। पतिवंचित मातृहृदय के लिए संसार में कोई अवलम्ब न था। पॉलिक्सेना ने धीरेसे माता के हाथों से अपने को छुड़ा लिया, मानो उससे कह रही थी- 'माता, धैर्य से काम लो ! अपने स्वामी की आत्मा को दुखी मत करो। ऐसा क्यों करती हो कि यह लोग निदर्यता से जमीन पर गिरकर मुझे अलग कर लें ?'
थायस का मुखचन्द्र इस शोकावस्था में और भी मधुर हो गया था,