थीं और उनके शब्दों के सम्मिश्रण से अत्यन्त मधुर संगीत की ध्वनि निकलती थी। जो पराणी इसका फल खाता था, उसे खनिज पदार्थों का, पत्थरों का, वनस्पतियों का, पराकृतिक और नैतिक नियमों का सम्पूर्ण ज्ञान पराप्त हो जाता था। लेकिन इसके फल अग्नि के समान थे और संशयात्मा भीरु पराणी भयवश उसे अपने होंठों पर रखने का साहस न कर सकते थे। पर हौवा ने तो सर्प के उपदेशों को बड़े ध्यान से सुना था इसलिए उसने इन निमूर्ल शंकाओं को तुच्छ समझा और उस फल को चखने पर उद्यत हो गयी,
थीं और उनके शब्दों के सम्मिश्रण से अत्यन्त मधुर संगीत की ध्वनि निकलती थी। जो पराणी इसका फल खाता था, उसे खनिज पदार्थों का, पत्थरों का, वनस्पतियों का, पराकृतिक और नैतिक नियमों का सम्पूर्ण ज्ञान पराप्त हो जाता था। लेकिन इसके फल अग्नि के समान थे और संशयात्मा भीरु पराणी भयवश उसे अपने होंठों पर रखने का साहस न कर सकते थे। पर हौवा ने तो सर्प के उपदेशों को बड़े ध्यान से सुना था इसलिए उसने इन निमूर्ल शंकाओं को तुच्छ समझा और उस फल को चखने पर उद्यत हो गयी,