गति से फिसलते चले जा रहे हैं। हमारा प्यारा मित्र जो किसी समय संसार का जीवनदाता था, जो भूमण्डल में परकाश फैलाता था, उसका समाधिस्तूप बन जायेगा। वह स्वयं अंधकार में लुप्त हो जायेगा। मृत्युदेव रासेपीज मानवभक्ति की अंतिम भेंट पायेगा और मैं अंतिम देवता का अन्तिम पुजारी सिद्ध हूंगा।'
इतने में एक विचित्र मूर्ति ने परदा उठाया और मेहमानों के सम्मुख एक कुबड़ा, नाटा मनुष्य उपस्थित हुआ जिसकी चांद पर एक बाल भी न था। वह एशिया निवासियों
गति से फिसलते चले जा रहे हैं। हमारा प्यारा मित्र जो किसी समय संसार का जीवनदाता था, जो भूमण्डल में परकाश फैलाता था, उसका समाधिस्तूप बन जायेगा। वह स्वयं अंधकार में लुप्त हो जायेगा। मृत्युदेव रासेपीज मानवभक्ति की अंतिम भेंट पायेगा और मैं अंतिम देवता का अन्तिम पुजारी सिद्ध हूंगा।'
इतने में एक विचित्र मूर्ति ने परदा उठाया और मेहमानों के सम्मुख एक कुबड़ा, नाटा मनुष्य उपस्थित हुआ जिसकी चांद पर एक बाल भी न था। वह एशिया निवासियों