सृष्टि रचना के पहले भी वह अनन्तकाल से विद्यमान था। बहुत सोचविचार के बाद उसने सृष्टि को रचने का निश्चय किया। अवश्य ही उस समय उसकी अवस्था अत्यन्त शोचनीय रही होगी। अगर सृष्टि की उत्पत्ति करता है तो उसकी अखण्डता, सम्पूर्णता में बाधा पड़ती है। अकर्मण्य बना बैठा रहता है तो उसे अपने अस्तित्व ही पर भरम होने लगता है, किसी को उसकी खबर ही नहीं होती, कोई उसकी चचार ही नहीं करता। आप कहते हैं, उसने अन्त में संसार की रचना को ही आवश्यक समझा। मैं आपकी बात मान लेता हूं,
सृष्टि रचना के पहले भी वह अनन्तकाल से विद्यमान था। बहुत सोचविचार के बाद उसने सृष्टि को रचने का निश्चय किया। अवश्य ही उस समय उसकी अवस्था अत्यन्त शोचनीय रही होगी। अगर सृष्टि की उत्पत्ति करता है तो उसकी अखण्डता, सम्पूर्णता में बाधा पड़ती है। अकर्मण्य बना बैठा रहता है तो उसे अपने अस्तित्व ही पर भरम होने लगता है, किसी को उसकी खबर ही नहीं होती, कोई उसकी चचार ही नहीं करता। आप कहते हैं, उसने अन्त में संसार की रचना को ही आवश्यक समझा। मैं आपकी बात मान लेता हूं,