स्थिर नहीं। इसलिए सौन्दर्य की इच्छा करना पागलपन नहीं तो क्या है ? यह बुद्धिसंगत नहीं है। जो स्वयं स्थायी नहीं है उसका भी उसी के साथ अन्त हो जाना अस्थिर है। दामिनी खिसकती हुई छांह को निगल जाय, यही अच्छा है।'
यूत्र्काइटीज ने ठण्डी सांस खींचकर कहा-'निसियास, तुम मुझे उस बालक के समान जान पड़ते हो जो घुटनों के बल चल रहा हो। मेरी बात मानो-स्वाधीन हो जाओ। स्वाधीन होकर तुम मनुष्य बन जाते हो।'
'यह क्योंकर हो सकता है यूत्र्काइटीज,
स्थिर नहीं। इसलिए सौन्दर्य की इच्छा करना पागलपन नहीं तो क्या है ? यह बुद्धिसंगत नहीं है। जो स्वयं स्थायी नहीं है उसका भी उसी के साथ अन्त हो जाना अस्थिर है। दामिनी खिसकती हुई छांह को निगल जाय, यही अच्छा है।'
यूत्र्काइटीज ने ठण्डी सांस खींचकर कहा-'निसियास, तुम मुझे उस बालक के समान जान पड़ते हो जो घुटनों के बल चल रहा हो। मेरी बात मानो-स्वाधीन हो जाओ। स्वाधीन होकर तुम मनुष्य बन जाते हो।'
'यह क्योंकर हो सकता है यूत्र्काइटीज,