अहमदनगर के प्रसिद्व सेनापति ’मलिक’ से लड़ रहे थे। उस समय सन् 1620 ई. की लड़ाई में शाह जी ने खूब वीरता दिखाई और कीर्ति के अधिकारी हुए। इस लड़ाई में उनके श्वसुर यादवराव भी उपस्थित थे। यद्यपि ’मलिक’ हार गया परन्तु समस्त इतिहास लेखक मानते हैं कि इस हार के उत्तदायी मरहठे न थे। इस लड़ाई में शाहजी भोंसले और यादवराव ने जो कार्य कर दिखाया उससे मुगलों की सेना में
छत्रपति शिवाजी 35
मरहठों की पूरी धाक जम गई और मुगल सेनापति इस प्रबन्ध
अहमदनगर के प्रसिद्व सेनापति ’मलिक’ से लड़ रहे थे। उस समय सन् 1620 ई. की लड़ाई में शाह जी ने खूब वीरता दिखाई और कीर्ति के अधिकारी हुए। इस लड़ाई में उनके श्वसुर यादवराव भी उपस्थित थे। यद्यपि ’मलिक’ हार गया परन्तु समस्त इतिहास लेखक मानते हैं कि इस हार के उत्तदायी मरहठे न थे। इस लड़ाई में शाहजी भोंसले और यादवराव ने जो कार्य कर दिखाया उससे मुगलों की सेना में
छत्रपति शिवाजी 35
मरहठों की पूरी धाक जम गई और मुगल सेनापति इस प्रबन्ध