ने मिलकर फिर शाहजी भोंसले से लड़ाई छेड़ दी। पूरे दो वर्ष लड़ाई होती रही परन्तु शाहजी इनके हाथ न आये। लाचार होकर शाहजहां ने बीजापुर के बादशाह के साथ सन्धि करने का प्रस्ताव किया अन्त में शाहजी भोंसले ने मुकाबला छोड़ दिया।
शाहजी भोंसले उस समय अपनी वीरता और चतुराई के कारण पूर्ण से प्रसिद्व हो चुका था। बीजापुर के बादशाह ने ऐसे मनुष्य को अपनी सहायता के लिए रखना बहुत अच्छा समझा और पूना का प्रान्त उसकी जागीर में मिला कर दे दिया। कुछ समय बाद कोन्हार,
ने मिलकर फिर शाहजी भोंसले से लड़ाई छेड़ दी। पूरे दो वर्ष लड़ाई होती रही परन्तु शाहजी इनके हाथ न आये। लाचार होकर शाहजहां ने बीजापुर के बादशाह के साथ सन्धि करने का प्रस्ताव किया अन्त में शाहजी भोंसले ने मुकाबला छोड़ दिया।
शाहजी भोंसले उस समय अपनी वीरता और चतुराई के कारण पूर्ण से प्रसिद्व हो चुका था। बीजापुर के बादशाह ने ऐसे मनुष्य को अपनी सहायता के लिए रखना बहुत अच्छा समझा और पूना का प्रान्त उसकी जागीर में मिला कर दे दिया। कुछ समय बाद कोन्हार,