के अनुसार इस प्रकार शत्रु को मारना पाप नहीं समझा। जैसा वर्तमान समय में समझा जाता है। राजपूतों का युद्वशासन तो अपनी पवित्रता, पुरूषार्थता और वीरता में सब जातियों से उच्च है। धोखा तथा दगा तो क्या! राजपूतों ने घिरे हुए शत्रु को मारना भी वीरता से बाहर समझाा अन्यथा उन्हें कई बार अवसर मिल चुके थे कि वे भारतवर्ष से यवनराज्य का नामोनिशान मिटा देते।
62 छत्रपति शिवाजी
अफ़ज़ल खां के मरते ही सम्पूर्ण सेना में खलबली मच गई और मराठों
के अनुसार इस प्रकार शत्रु को मारना पाप नहीं समझा। जैसा वर्तमान समय में समझा जाता है। राजपूतों का युद्वशासन तो अपनी पवित्रता, पुरूषार्थता और वीरता में सब जातियों से उच्च है। धोखा तथा दगा तो क्या! राजपूतों ने घिरे हुए शत्रु को मारना भी वीरता से बाहर समझाा अन्यथा उन्हें कई बार अवसर मिल चुके थे कि वे भारतवर्ष से यवनराज्य का नामोनिशान मिटा देते।
62 छत्रपति शिवाजी
अफ़ज़ल खां के मरते ही सम्पूर्ण सेना में खलबली मच गई और मराठों