कारण इसकी नौकरी स्वीकार की थी। ’भूभराय घाटमी’ एक बड़ा मान्य मरहठा था जो किसी समय शिवाजी के पिता शाहजी का परम मित्र था शिवाजी उसे इस बात पर उद्यत न कर सका कि वह बीजापुर की पौकरी छोड़ कर शिवाजी की नौकरी करे फिर भी शिवाजी ने उसको बहुत सा पुरस्कार देकर विदा किया था। अपनी सेना के चोट खाये हुए वीरों को उन्होंने बहुत सी बहुमूल्य वस्तुएं ( सोने के हार तथा चांदी की जंजीरें ) उपहार में दी थीं साधारण रीति से वह अपनी सेना को प्रसन्न
कारण इसकी नौकरी स्वीकार की थी। ’भूभराय घाटमी’ एक बड़ा मान्य मरहठा था जो किसी समय शिवाजी के पिता शाहजी का परम मित्र था शिवाजी उसे इस बात पर उद्यत न कर सका कि वह बीजापुर की पौकरी छोड़ कर शिवाजी की नौकरी करे फिर भी शिवाजी ने उसको बहुत सा पुरस्कार देकर विदा किया था। अपनी सेना के चोट खाये हुए वीरों को उन्होंने बहुत सी बहुमूल्य वस्तुएं ( सोने के हार तथा चांदी की जंजीरें ) उपहार में दी थीं साधारण रीति से वह अपनी सेना को प्रसन्न