जिस प्रकार ज्वालामुखी पर्वत मुद्दतों के विकारों का अपने भीतर लीन करके पुनः एक दिन अकस्मात् फूट पड़ता है, और अपनी भभक से आगा पीछा नहीं देखता। इसी प्रकार दक्षिण भारत के वीरों में जो विकार दीर्घकाल से भरा हुआ था वह शिवाजी का रूप धर कर फूट निकला। इसका फल यह हुआ कि जो मार्ग में आया झुलस गया और चारों ओर जहां भी शिवाजी ने हथियार उठाया, अपना सिक्का जमा दिया। शिवाजी ऐसे भोले न थे कि वे इस प्रसन्नता में यह भूल जाते कि उनकी जााति
जिस प्रकार ज्वालामुखी पर्वत मुद्दतों के विकारों का अपने भीतर लीन करके पुनः एक दिन अकस्मात् फूट पड़ता है, और अपनी भभक से आगा पीछा नहीं देखता। इसी प्रकार दक्षिण भारत के वीरों में जो विकार दीर्घकाल से भरा हुआ था वह शिवाजी का रूप धर कर फूट निकला। इसका फल यह हुआ कि जो मार्ग में आया झुलस गया और चारों ओर जहां भी शिवाजी ने हथियार उठाया, अपना सिक्का जमा दिया। शिवाजी ऐसे भोले न थे कि वे इस प्रसन्नता में यह भूल जाते कि उनकी जााति