छत्रपति शिवाजी - Chhatrapati Shivaji

उनका रक्त बिगड़ कर सड़ने लग गया था। परन्तु फिर भी जरा सी चोट के लगने से ज्वालामुखी पर्वतों के समान उबल पड़ता था। और प्रमाद में अन्धे होकर बैठे रहें तो मुद्दतों चूं न करें, चाहे इधर की दुनिया उधर हो जाये परन्तु जब एक बार सामना करने की ठान लें तो प्रलय कर दें।

क्रोध से यदि भाल में रेखा हमारे आ पड़े।

शीश पर हो शीश तन पर तन व कर पर कर चढ़े।।

क्ुरते की बाहें यदि चढ़ें, आकाश भी हिल जायेगा।

बस उस तरह से ही तुरन्त तख़्ता ज़मीं थर्रायगा।।


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उनका रक्त बिगड़ कर सड़ने लग गया था। परन्तु फिर भी जरा सी चोट के लगने से ज्वालामुखी पर्वतों के समान उबल पड़ता था। और प्रमाद में अन्धे होकर बैठे रहें तो मुद्दतों चूं न करें, चाहे इधर की दुनिया उधर हो जाये परन्तु जब एक बार सामना करने की ठान लें तो प्रलय कर दें।

क्रोध से यदि भाल में रेखा हमारे आ पड़े।

शीश पर हो शीश तन पर तन व कर पर कर चढ़े।।

क्ुरते की बाहें यदि चढ़ें, आकाश भी हिल जायेगा।

बस उस तरह से ही तुरन्त तख़्ता ज़मीं थर्रायगा।।


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