द्वारा लिखे गये ये जीवनचरित हमारे अनुमान से उन्नीसवीं शताब्दी की समाप्ति के पहले ही लिखे जा चुके थे। राष्ट्र नेता की भव्य छवि को धारण करने वाले लालाजी का पाठक वर्ग देशव्यापी रहा होगा, यह तो सत्य ही है। अतः उनके लिखे जीवनचरितों का तत्काल हिन्दी अनुवाद हुआ और पाठकों को ये जीवनियां सुलभ हो गई। तथापि यह ध्यान रखना होगा कि आज से सौ वर्ष पहले का हिन्दी गद्य न तो परिष्कृत था और न गद्य लेखन में एकरूपता आ पाई थी। शब्दों के रूप्
द्वारा लिखे गये ये जीवनचरित हमारे अनुमान से उन्नीसवीं शताब्दी की समाप्ति के पहले ही लिखे जा चुके थे। राष्ट्र नेता की भव्य छवि को धारण करने वाले लालाजी का पाठक वर्ग देशव्यापी रहा होगा, यह तो सत्य ही है। अतः उनके लिखे जीवनचरितों का तत्काल हिन्दी अनुवाद हुआ और पाठकों को ये जीवनियां सुलभ हो गई। तथापि यह ध्यान रखना होगा कि आज से सौ वर्ष पहले का हिन्दी गद्य न तो परिष्कृत था और न गद्य लेखन में एकरूपता आ पाई थी। शब्दों के रूप्