देते रहें तो हमारी नादानी होगी। आगे के पृष्ठों में हम शारीरिक शक्ति, बल, पराक्रम और साहस का एक ऐसा उदाहरण पेश करेंगे जिसने स्वधर्म की रक्षा तथा अपने वंश की उन्नति के लिए कैसा पुरूषार्थ किया था। शिवाजी का जन्म ऐसे युग में हुआ था जब भारत से विद्या और धर्मप्रेम प्रायः समाप्त हो चुका था और परिवार के सदस्यों का पारस्परिक विश्वास और प्रेम लुप्त हो रहा था। किसी का धर्म या धन सुरक्षित नहीं था। सचमुच वह समय बड़ा विकट था जबकि हिन्दू
देते रहें तो हमारी नादानी होगी। आगे के पृष्ठों में हम शारीरिक शक्ति, बल, पराक्रम और साहस का एक ऐसा उदाहरण पेश करेंगे जिसने स्वधर्म की रक्षा तथा अपने वंश की उन्नति के लिए कैसा पुरूषार्थ किया था। शिवाजी का जन्म ऐसे युग में हुआ था जब भारत से विद्या और धर्मप्रेम प्रायः समाप्त हो चुका था और परिवार के सदस्यों का पारस्परिक विश्वास और प्रेम लुप्त हो रहा था। किसी का धर्म या धन सुरक्षित नहीं था। सचमुच वह समय बड़ा विकट था जबकि हिन्दू