रहता। दुष्टों में दुष्ट समझे जानेवाले इस घातक डाकू के मन में भी मेरे लिए इतनी सहानुभूति है, यह देखकर मैं दंग था। यही अनुभव आगे चलकर मुझे बार-बार हुआ। मैं उसका आभार प्रदर्शित करने लगा, परंतु जल्दी-जल्दी में उसने कहा, ‘‘दादा, तुरंत से पहले लिखकर दो।’’
छूटेंगे या मरेंगे
तथापि शंका हुई,‘लिखवाकर इस पाटी को कहीं यह बाल के हाथ न सौंपकर अधिकारियों को न सौंप दे? मेरा जीवन गुप्तचरों से दंाव-पेंच खेलते हुए व्यतीत हुआ था। अतः मैंने किसी का भी नाम,
रहता। दुष्टों में दुष्ट समझे जानेवाले इस घातक डाकू के मन में भी मेरे लिए इतनी सहानुभूति है, यह देखकर मैं दंग था। यही अनुभव आगे चलकर मुझे बार-बार हुआ। मैं उसका आभार प्रदर्शित करने लगा, परंतु जल्दी-जल्दी में उसने कहा, ‘‘दादा, तुरंत से पहले लिखकर दो।’’
छूटेंगे या मरेंगे
तथापि शंका हुई,‘लिखवाकर इस पाटी को कहीं यह बाल के हाथ न सौंपकर अधिकारियों को न सौंप दे? मेरा जीवन गुप्तचरों से दंाव-पेंच खेलते हुए व्यतीत हुआ था। अतः मैंने किसी का भी नाम,