को जलते-सुलगते रहना ही है तो भला वह हम ही क्यों न हों? इस तरह मात्र जलते रहना भी एक कर्म ही है । इतना ही नहीं, अपितु महत्कर्म है।’¹ ं ं ं ंवाॅर्डर ने संकेत रूप में खांसकर सूचित किया, ‘जल्दी करो’। मैं पाटी को द्वार के निकट रख पीछे हट गया। जाते-जाते उससे कहा, ‘‘मैं चाहता हूं, मेरे कारण आपको जरा सा भी कष्ट न पहुुंचे। आप चाहें और यदि आपको यह कर्तव्य लगता हो तो ही ऐसा साहस करें। हमने भरे गांव में प्रवेश करके सरे बाज़ार डाका डाला है और लड़ते-लड़ते निकल भी गए। दादा,
को जलते-सुलगते रहना ही है तो भला वह हम ही क्यों न हों? इस तरह मात्र जलते रहना भी एक कर्म ही है । इतना ही नहीं, अपितु महत्कर्म है।’¹ ं ं ं ंवाॅर्डर ने संकेत रूप में खांसकर सूचित किया, ‘जल्दी करो’। मैं पाटी को द्वार के निकट रख पीछे हट गया। जाते-जाते उससे कहा, ‘‘मैं चाहता हूं, मेरे कारण आपको जरा सा भी कष्ट न पहुुंचे। आप चाहें और यदि आपको यह कर्तव्य लगता हो तो ही ऐसा साहस करें। हमने भरे गांव में प्रवेश करके सरे बाज़ार डाका डाला है और लड़ते-लड़ते निकल भी गए। दादा,