मेरा आजीवन कारावास - Mera Aajivan Karavas

दिन मैंने उसे अन्योक्ति द्वारा सूचित करने का प्रयास किया-माना कि स्वार्थ हेतू लूटमार एक प्रकार से वीरता है तथापि वह श्रेयस्कर अथवा प्रशंसनीय नहीं है। वह भी समझ गया और आगे फिर कभी उसने डींग हांककर डाका डालने का उल्लेख नहीं किया।

मेरे आने के पश्चात् एक-दो दिन के अंदर की बाल को ठाणे से स्ािानांतरित करके कहीं अन्यत्र भेजा गया। अधिकारी जानते थे, यद्यपि इसमें संदिग्धता थी कि पुनः उसकी भेंट होगी या नहीं, तथापि इतने निकट एक


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दिन मैंने उसे अन्योक्ति द्वारा सूचित करने का प्रयास किया-माना कि स्वार्थ हेतू लूटमार एक प्रकार से वीरता है तथापि वह श्रेयस्कर अथवा प्रशंसनीय नहीं है। वह भी समझ गया और आगे फिर कभी उसने डींग हांककर डाका डालने का उल्लेख नहीं किया।

मेरे आने के पश्चात् एक-दो दिन के अंदर की बाल को ठाणे से स्ािानांतरित करके कहीं अन्यत्र भेजा गया। अधिकारी जानते थे, यद्यपि इसमें संदिग्धता थी कि पुनः उसकी भेंट होगी या नहीं, तथापि इतने निकट एक


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