उसमें अर्थात् अंदमान के उस द्वार के अंदर पांव रखते ही जिस कोठरी में मुझे बंद किया गया था, वह कोठरी यद्यपि अकेली थी तथापि उससे एक के बाद एक लगी हुई कोठरियों में अंदमान जा रहे सारे बंदियों के भरे होने और भोजन करते-घुमते उनके भाषण, उसांसें, रोना और हंसना यह सब युनने और देखने से बहुत दिन के मेरे मन को उस दुःख में भी कुछ आनंद आए बिना न रहा। मैंने उन बंदियों का ‘हंसना’ जो कहा, वह सच है। दुःख और यातनाओं की भयपद्र सुरंग के दुःख
उसमें अर्थात् अंदमान के उस द्वार के अंदर पांव रखते ही जिस कोठरी में मुझे बंद किया गया था, वह कोठरी यद्यपि अकेली थी तथापि उससे एक के बाद एक लगी हुई कोठरियों में अंदमान जा रहे सारे बंदियों के भरे होने और भोजन करते-घुमते उनके भाषण, उसांसें, रोना और हंसना यह सब युनने और देखने से बहुत दिन के मेरे मन को उस दुःख में भी कुछ आनंद आए बिना न रहा। मैंने उन बंदियों का ‘हंसना’ जो कहा, वह सच है। दुःख और यातनाओं की भयपद्र सुरंग के दुःख