उस रात मैं सलाखों से बंद द्वार के निकट खड़ा रहकर बीभत्सता का वह नंगा नृत्य सुन-देख रहा था। बहुत दिनों के पश्चात् इतने स्वर तथा कोलाहल सुन रहा था। एकांतवास से मेरा मन चिड़चिड़ा हो गया था, वही संतप्त मन उस बीभत्सता, भोंडेपन से धृणा कर पीछे हटने की बजाय मनोविकारों के विस्फोट से आग लगा। मिट्टी के तेल का कनस्तर जैसे एकदम लपेटों में घिर जाए- उसके उजाले में वह तमाशा देखता रहा और देखते-देखते ही उस कारण तथा स्वरूप का तात्तिवक पृथक्करण
उस रात मैं सलाखों से बंद द्वार के निकट खड़ा रहकर बीभत्सता का वह नंगा नृत्य सुन-देख रहा था। बहुत दिनों के पश्चात् इतने स्वर तथा कोलाहल सुन रहा था। एकांतवास से मेरा मन चिड़चिड़ा हो गया था, वही संतप्त मन उस बीभत्सता, भोंडेपन से धृणा कर पीछे हटने की बजाय मनोविकारों के विस्फोट से आग लगा। मिट्टी के तेल का कनस्तर जैसे एकदम लपेटों में घिर जाए- उसके उजाले में वह तमाशा देखता रहा और देखते-देखते ही उस कारण तथा स्वरूप का तात्तिवक पृथक्करण