व्याकुल प्राण होने पर उन कष्टों के शारीरिक तथा मानसिक आघात सहती हुई खड़ी थी, जैसे एक बार बहका हुआ हठी गजराज अपने गंडस्थल पर तीक्ष्ण-से-तीक्ष्ण आघातों को ‘उफ’ तक न करते हुए सहता है और अडिऋयल बना अचल खड़ा रहता है। इस कोठरी में वह वीर पुरूष सलाखों के पास उसी तरह हाथ मलता हुआ खड़ा रहा होगा जैसे पक्षीराज गरूड़ पिंजरे के पास झुंझलाता, झल्लाता हुआ रहता है। मेरी चिंता तो नहीं करते होंगे? या मन में यह तो नहीं कहते होंगे- क्या हुआ
व्याकुल प्राण होने पर उन कष्टों के शारीरिक तथा मानसिक आघात सहती हुई खड़ी थी, जैसे एक बार बहका हुआ हठी गजराज अपने गंडस्थल पर तीक्ष्ण-से-तीक्ष्ण आघातों को ‘उफ’ तक न करते हुए सहता है और अडिऋयल बना अचल खड़ा रहता है। इस कोठरी में वह वीर पुरूष सलाखों के पास उसी तरह हाथ मलता हुआ खड़ा रहा होगा जैसे पक्षीराज गरूड़ पिंजरे के पास झुंझलाता, झल्लाता हुआ रहता है। मेरी चिंता तो नहीं करते होंगे? या मन में यह तो नहीं कहते होंगे- क्या हुआ