मैं चला गया तो? वह तो पीछे है न? फिर चिंता काहे की? वह देख लेगा। यदि यह कहते होंगे तो अब मुझे भी इसी आहत होते देखकर उन्हें कैसा प्रतीत होगा? उन्हें कितना आघात पहुंचेगा? इससे अच्छा है, यदि उनसे मेरी प्रत्यक्ष भेंट न हो और मुझे भिन्न-भिन्न वार्डों में रखा जाए।
मेरे विचार से यदि मुझ अकेले को ही दंड भुगतना पड़ता तो मेरे मन को उन वेदनाओं का, जो मैंने भुगती है, पचासवां हिस्सा ही भोगना नहीं पड़ता। परंतु एक तो मैं अपनी वेदनाएं
मैं चला गया तो? वह तो पीछे है न? फिर चिंता काहे की? वह देख लेगा। यदि यह कहते होंगे तो अब मुझे भी इसी आहत होते देखकर उन्हें कैसा प्रतीत होगा? उन्हें कितना आघात पहुंचेगा? इससे अच्छा है, यदि उनसे मेरी प्रत्यक्ष भेंट न हो और मुझे भिन्न-भिन्न वार्डों में रखा जाए।
मेरे विचार से यदि मुझ अकेले को ही दंड भुगतना पड़ता तो मेरे मन को उन वेदनाओं का, जो मैंने भुगती है, पचासवां हिस्सा ही भोगना नहीं पड़ता। परंतु एक तो मैं अपनी वेदनाएं