अंदमान के लिए एक अंगोछा, एक चद्दर और एक बंडी- इस तरह का वेश, बगल में जैसे-तैसे दबाया हुआ टाट और कंबल का बिस्तर, जिसे उस टाट के खुदरेपन तथा कठोरता के कारण लपेटना कठिन हो रहा था और एक हाथ में टीन के ‘थाली पाट’। पुनः वह टोली एक पंक्ति में तालबद्व बेड़ियां झनझनाती हुई चली। जो कोई भी दिखे, उसे ‘राम-राम, चले भैया कालापानी’ कहते हुए राम-राम का आदान-प्रदान करती हुई वह टोली चल रही थी।
जेल के द्वार पर आते ही वह टोली बाहर निकली।
अंदमान के लिए एक अंगोछा, एक चद्दर और एक बंडी- इस तरह का वेश, बगल में जैसे-तैसे दबाया हुआ टाट और कंबल का बिस्तर, जिसे उस टाट के खुदरेपन तथा कठोरता के कारण लपेटना कठिन हो रहा था और एक हाथ में टीन के ‘थाली पाट’। पुनः वह टोली एक पंक्ति में तालबद्व बेड़ियां झनझनाती हुई चली। जो कोई भी दिखे, उसे ‘राम-राम, चले भैया कालापानी’ कहते हुए राम-राम का आदान-प्रदान करती हुई वह टोली चल रही थी।
जेल के द्वार पर आते ही वह टोली बाहर निकली।