जाते हैं। उस समय इस बात का आकलन होने से कि मै। शव बन रहा हूं, मुझे इस यथार्थ बोध का ही अधिक दुःख था कि हजारों देशबाध्ंाव मेरी ओर मात्र आंखें फाड़-फाड़कर देख रहे हैं। काश, उनमें से एक भी मनुष्य मुझे इस तरह ढाढ़स बंधा पाता कि ‘जाओ बंधु, जाओ! तुम्हारे पीछे मैं और हम तुम्हारे व्रत को पूरा करके अपने इस हिंदुस्थान के ं ं ं ’ तो मेरी वह अरथी मेरे लिए फूलों की सेज बन जाती।
प्रकरण-5
कालेपानी का सागर
उस जलयान की सीढ़ी से चढ़ाकर
जाते हैं। उस समय इस बात का आकलन होने से कि मै। शव बन रहा हूं, मुझे इस यथार्थ बोध का ही अधिक दुःख था कि हजारों देशबाध्ंाव मेरी ओर मात्र आंखें फाड़-फाड़कर देख रहे हैं। काश, उनमें से एक भी मनुष्य मुझे इस तरह ढाढ़स बंधा पाता कि ‘जाओ बंधु, जाओ! तुम्हारे पीछे मैं और हम तुम्हारे व्रत को पूरा करके अपने इस हिंदुस्थान के ं ं ं ’ तो मेरी वह अरथी मेरे लिए फूलों की सेज बन जाती।
प्रकरण-5
कालेपानी का सागर
उस जलयान की सीढ़ी से चढ़ाकर