की। ‘‘आपसे मिलने हम हेतुपूर्वक आए थे। ईश्वर आपको वापस स्वदेश ले आए, यही हमारी हार्दिक कामना है।’’ इतना कहते हुए वे सभी अधिकारी अपनी टोपियां उतारकर प्रणाम करके चले गए। एक गोरे गृहस्थ को जैसे उनका यह व्यवहार अखर गया और वह हेय तथा क्रुद्व दृष्टि से उन्हें और मुझे घूरकर बिना प्रणाम
किए चलता बना । जैसे उसकी दृष्टि जता रही थी-’ भला इस पापी बंदी को इतना सम्मान क्यों?’
प्रस्थान
जहाज की सीटी के पश्चात् भों-भों-भों की कर्णकटु
की। ‘‘आपसे मिलने हम हेतुपूर्वक आए थे। ईश्वर आपको वापस स्वदेश ले आए, यही हमारी हार्दिक कामना है।’’ इतना कहते हुए वे सभी अधिकारी अपनी टोपियां उतारकर प्रणाम करके चले गए। एक गोरे गृहस्थ को जैसे उनका यह व्यवहार अखर गया और वह हेय तथा क्रुद्व दृष्टि से उन्हें और मुझे घूरकर बिना प्रणाम
किए चलता बना । जैसे उसकी दृष्टि जता रही थी-’ भला इस पापी बंदी को इतना सम्मान क्यों?’
प्रस्थान
जहाज की सीटी के पश्चात् भों-भों-भों की कर्णकटु