आवाज आई और एक हिचकोले के साथ जहाज चल पड़ा। उसक पिंजडे़ की ऊंचाई पर दो-तीन छोटी-छोटी गोलाकार खिड़कियां थी, जो शीशे से बंद की गई थी। उनसे लटकते हुए, उन अभागे दंडितों में से कुछ तट की ओर टकटकी लगाकर देखने लगे-किनारा दृष्टि से ओझल हो गया। ‘घर छूट गया भई, घर छूट गया’ कहते हुए उनमें से एक धम्म से नीेचे बैठ गया। यह सुनते ही‘ अब अपना देश हम पुन‘ कब देखेंगे?’ ऐसे बिलबिलाते हुए सतारा की ओर के दो किसान फूट-फूटकर रोने लगे। ‘अब कालापानी लग गया! भैया,
आवाज आई और एक हिचकोले के साथ जहाज चल पड़ा। उसक पिंजडे़ की ऊंचाई पर दो-तीन छोटी-छोटी गोलाकार खिड़कियां थी, जो शीशे से बंद की गई थी। उनसे लटकते हुए, उन अभागे दंडितों में से कुछ तट की ओर टकटकी लगाकर देखने लगे-किनारा दृष्टि से ओझल हो गया। ‘घर छूट गया भई, घर छूट गया’ कहते हुए उनमें से एक धम्म से नीेचे बैठ गया। यह सुनते ही‘ अब अपना देश हम पुन‘ कब देखेंगे?’ ऐसे बिलबिलाते हुए सतारा की ओर के दो किसान फूट-फूटकर रोने लगे। ‘अब कालापानी लग गया! भैया,