समय समान वेदनाओं से जनित आसुओं के कारण स्निग्ध होने वाले मधुर आनंद का अनुभव करने के लिए हमारा ह्नदय हमारी मुक्तता के क्षणों से स्वाभाविक ही व्याकुल होता आया है।
फिर भी आज तक अंदमान की कहानी होठों तक पहुंचने पर भी किसी तरह होंठों से बाहर नहीं निकल रही थी। अंधकार में बढ़नेवाली किसी कंटीली पुश्पलता की भांति उन अंधियारे दिनों की याद उजियारे को देखते ही सूखने लगती, भौंचक्का हो जाती।
कभी लगता था, क्या बताने के उद्देश्य से
समय समान वेदनाओं से जनित आसुओं के कारण स्निग्ध होने वाले मधुर आनंद का अनुभव करने के लिए हमारा ह्नदय हमारी मुक्तता के क्षणों से स्वाभाविक ही व्याकुल होता आया है।
फिर भी आज तक अंदमान की कहानी होठों तक पहुंचने पर भी किसी तरह होंठों से बाहर नहीं निकल रही थी। अंधकार में बढ़नेवाली किसी कंटीली पुश्पलता की भांति उन अंधियारे दिनों की याद उजियारे को देखते ही सूखने लगती, भौंचक्का हो जाती।
कभी लगता था, क्या बताने के उद्देश्य से