वह सब भुगत लिया था? तो फिर उसे निद्रा अभिनय की कहना चाहिए। कभी लगता था, हमें जो यातनाएं भुगतनी पड़ीं उन यातनाओं को भुगतते-भुगतते जो लोग उन यातनाओं के शिकार हो गए, उनको तो घर लौटकर प्रियजनों को अपने वे सुख-दुःख बताने का भी संतोश नहीं प्राप्त हुआ। वे साथी आज हमारे बीच नहीं हैं, जिनके साथ तप की जलन को सह लिया था, उनको छोड़कर समारोह की दावत के पकवान अकेले ही कैसे खाएं? क्या यह उनके साथ प्रताड़ना नहीं होगी?
और हम जैसे कतिपय
वह सब भुगत लिया था? तो फिर उसे निद्रा अभिनय की कहना चाहिए। कभी लगता था, हमें जो यातनाएं भुगतनी पड़ीं उन यातनाओं को भुगतते-भुगतते जो लोग उन यातनाओं के शिकार हो गए, उनको तो घर लौटकर प्रियजनों को अपने वे सुख-दुःख बताने का भी संतोश नहीं प्राप्त हुआ। वे साथी आज हमारे बीच नहीं हैं, जिनके साथ तप की जलन को सह लिया था, उनको छोड़कर समारोह की दावत के पकवान अकेले ही कैसे खाएं? क्या यह उनके साथ प्रताड़ना नहीं होगी?
और हम जैसे कतिपय