‘‘ठीक है। आज न सही, फिर कभी चर्चा करेंगे।’’ इस तरह सहजतापूर्वक बोलने के साथ मेरे स्वास्थ्य के संबंध में सहानुभूति पूछताछ करके बारी साहब चले गए।
अनुष्टुप् छंद
अगले दो दिन मुझे कुछ भी नहीं दिया गया। मुझसे कहा गया, महीना-दो महीना मेरा व्यवहार देखकर मुझे पुस्तक दी जाएगी। कागज का टुकड़ा मिलना तो सर्वथा असंभव था, बात करने के लिए चिड़िया तक नहीं थी। तब इस कालकोठरी में दिन काटने का उत्तम साधन मैंने निश्चित किया, उन कविताओं
‘‘ठीक है। आज न सही, फिर कभी चर्चा करेंगे।’’ इस तरह सहजतापूर्वक बोलने के साथ मेरे स्वास्थ्य के संबंध में सहानुभूति पूछताछ करके बारी साहब चले गए।
अनुष्टुप् छंद
अगले दो दिन मुझे कुछ भी नहीं दिया गया। मुझसे कहा गया, महीना-दो महीना मेरा व्यवहार देखकर मुझे पुस्तक दी जाएगी। कागज का टुकड़ा मिलना तो सर्वथा असंभव था, बात करने के लिए चिड़िया तक नहीं थी। तब इस कालकोठरी में दिन काटने का उत्तम साधन मैंने निश्चित किया, उन कविताओं