जैसे एक-दो सूक्ष्म नियम जो वृत्तदर्पण में नहीं दिए गए थे, स्वयं ही ढूंढ़ निकालने पड़े । तब विरचित अनुष्टुप् को घिस-घिसकर तीसरा संस्करण निकालना पड़ा। यह सारा गोरखध्ंाधा साधनाभाव के कारण करना पड़ा। वृत्तशास्त्र की एक भी पुस्तक मिलती तो एक घंटे में निर्णय हो जाता। कारागृह में मैं जो साहित्य-सृजन कर सका, उसके लिए साधन-सामग्री का अभाव होने के कारण काफी त्रास हुआ-एक तारीख के लिए, एक शब्द के लिए आठ-आठ दिन अटकना पड़ता। कल्पना लाख
जैसे एक-दो सूक्ष्म नियम जो वृत्तदर्पण में नहीं दिए गए थे, स्वयं ही ढूंढ़ निकालने पड़े । तब विरचित अनुष्टुप् को घिस-घिसकर तीसरा संस्करण निकालना पड़ा। यह सारा गोरखध्ंाधा साधनाभाव के कारण करना पड़ा। वृत्तशास्त्र की एक भी पुस्तक मिलती तो एक घंटे में निर्णय हो जाता। कारागृह में मैं जो साहित्य-सृजन कर सका, उसके लिए साधन-सामग्री का अभाव होने के कारण काफी त्रास हुआ-एक तारीख के लिए, एक शब्द के लिए आठ-आठ दिन अटकना पड़ता। कल्पना लाख