क्रांतिकारियों को गीता पढ़ाते समय वे उपदेश देते-‘देह तो कुछ भी नहीं, आत्मा अमर है। ‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि।’ अतः युवक मरणमारण की चिंता नहीं करते। परंतु जब कारागार की पाषाणी प्राचीर का प्रत्यक्ष दर्शन हुआ और कोल्हू जैसे कठोर काम करते-करते-जिससे बैल भी रूआंसे हो जाते- एक दिन सिर चकराकर गिरना पड़ा, तब मानो प्रतिशोध के लिए ही देह ने आत्मा को पैरों तले कुचलकर उनके मनोबल को चकनाचुर कर डाला। किसी भ्ज्ञी तरह उन कष्टों से बचना कठिन हो गया। अच्छा,
क्रांतिकारियों को गीता पढ़ाते समय वे उपदेश देते-‘देह तो कुछ भी नहीं, आत्मा अमर है। ‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि।’ अतः युवक मरणमारण की चिंता नहीं करते। परंतु जब कारागार की पाषाणी प्राचीर का प्रत्यक्ष दर्शन हुआ और कोल्हू जैसे कठोर काम करते-करते-जिससे बैल भी रूआंसे हो जाते- एक दिन सिर चकराकर गिरना पड़ा, तब मानो प्रतिशोध के लिए ही देह ने आत्मा को पैरों तले कुचलकर उनके मनोबल को चकनाचुर कर डाला। किसी भ्ज्ञी तरह उन कष्टों से बचना कठिन हो गया। अच्छा,