एक-दो दिन का भी प्रश्न नहीं था, पूरे जीवन का प्रशन था। उन कष्टों से कभ्ज्ञी मुक्ति नहीं मिलनी थी। सके विरीत हठ पर अड़े रहें तो इससे भी अधिक भ्यंकर कष्ट भुगतने पड़ेंगे। इस तरह निराशा के घनघोर अंधेरे में दम घुटने लग जाए और प्राण उड़ने लग जाएं तो देह प्राण से गठबंधन करके चिल्लाने लगे कि कुछ भी करो, परंतु मेरी बात मानो। परंतु मार्ग? विपदाओं की दमघोंटू दीवारों से बाहर निकलने के लिए मार्ग कहां से मिलेगा?
बस एक ही संकरी, गंदली,
एक-दो दिन का भी प्रश्न नहीं था, पूरे जीवन का प्रशन था। उन कष्टों से कभ्ज्ञी मुक्ति नहीं मिलनी थी। सके विरीत हठ पर अड़े रहें तो इससे भी अधिक भ्यंकर कष्ट भुगतने पड़ेंगे। इस तरह निराशा के घनघोर अंधेरे में दम घुटने लग जाए और प्राण उड़ने लग जाएं तो देह प्राण से गठबंधन करके चिल्लाने लगे कि कुछ भी करो, परंतु मेरी बात मानो। परंतु मार्ग? विपदाओं की दमघोंटू दीवारों से बाहर निकलने के लिए मार्ग कहां से मिलेगा?
बस एक ही संकरी, गंदली,