‘‘जो कहना है, वह बंदीपाल को कहो।’’
विश्वासघात
अधिकारी चला गया। पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार बंदीपाल ने कागज और स्याही भिजवाई । ये सज्जन कलकत्ता के षड्यंत्र की जानकारी लिखकर देने लगे। आश्चर्य की बात यह है कि उस दुर्बल मनोदशा में भी उस सज्जन में, जो यह कर्म करने के लिए तत्पर हुए थे, इतनी प्रामाणिकता शेष थी कि इस कर्म को बुरा समझा जाए। उन्हांेने अपने मित्र को एक पत्र भेजा-‘ये कष्ट मुझसे नहीं सहे जाते। उन्हें टालने
‘‘जो कहना है, वह बंदीपाल को कहो।’’
विश्वासघात
अधिकारी चला गया। पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार बंदीपाल ने कागज और स्याही भिजवाई । ये सज्जन कलकत्ता के षड्यंत्र की जानकारी लिखकर देने लगे। आश्चर्य की बात यह है कि उस दुर्बल मनोदशा में भी उस सज्जन में, जो यह कर्म करने के लिए तत्पर हुए थे, इतनी प्रामाणिकता शेष थी कि इस कर्म को बुरा समझा जाए। उन्हांेने अपने मित्र को एक पत्र भेजा-‘ये कष्ट मुझसे नहीं सहे जाते। उन्हें टालने