मेरा आजीवन कारावास - Mera Aajivan Karavas

भरपूर चपलता भर देती है। मैं उठा। साहब किसलिए बुलाते हैं, यह पूछने का मन हुआ परंतु जब तक कोई कुछ न कहे तब तक किसी भी अधिकारी से स्वयं कुछ भी पूछना नहीं चाहिए, ऐसी प्रथा होने के कारण मैं कुछ बोला नहीं। पर वह सुशील हवलदार ही धीरे से बोला,’लगता है, कोई मिलनी आई है।’’

पत्नी से भेंट

कार्यालय में आते ही मैंने देखा, सलाखों की खिड़की के पास मेरे बड़े साले साहब1 खड़े हैं- साथ में मेरी धर्मपत्नी2 । बंदीगृह के वेश में, कैदी के दुःखद स्वरूप में,


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भरपूर चपलता भर देती है। मैं उठा। साहब किसलिए बुलाते हैं, यह पूछने का मन हुआ परंतु जब तक कोई कुछ न कहे तब तक किसी भी अधिकारी से स्वयं कुछ भी पूछना नहीं चाहिए, ऐसी प्रथा होने के कारण मैं कुछ बोला नहीं। पर वह सुशील हवलदार ही धीरे से बोला,’लगता है, कोई मिलनी आई है।’’

पत्नी से भेंट

कार्यालय में आते ही मैंने देखा, सलाखों की खिड़की के पास मेरे बड़े साले साहब1 खड़े हैं- साथ में मेरी धर्मपत्नी2 । बंदीगृह के वेश में, कैदी के दुःखद स्वरूप में,


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