काट रहा था। इतने में द्वार खटका। असमय द्वार खटका था-स्पश्ट है, अपने बंदी बने भाग्य में कुछ नई बात लिखी जानेवाली है। जिज्ञासावश मैंने ऊपर देखा, तो हवलदार ने कहा, ’’चलो, साहब बलाते हैं!’’ चाहे किसी बहाने भी क्यों न हो परंतु इस एकांत कोठरी से बाहर निकलने के लिए किसी भी कैदी का मन इतना तत्पर होता है कि ’चलो’ शब्द कान में पड़ते ही बंदी के मन में वैसा ही उत्साह
भर देता है जैसा तड़ाक् से टूटते हुए रस्से की आवाज उससे बंधे हुए चैपाये के मन में पल भर के लिए ही क्यों न हो,
काट रहा था। इतने में द्वार खटका। असमय द्वार खटका था-स्पश्ट है, अपने बंदी बने भाग्य में कुछ नई बात लिखी जानेवाली है। जिज्ञासावश मैंने ऊपर देखा, तो हवलदार ने कहा, ’’चलो, साहब बलाते हैं!’’ चाहे किसी बहाने भी क्यों न हो परंतु इस एकांत कोठरी से बाहर निकलने के लिए किसी भी कैदी का मन इतना तत्पर होता है कि ’चलो’ शब्द कान में पड़ते ही बंदी के मन में वैसा ही उत्साह
भर देता है जैसा तड़ाक् से टूटते हुए रस्से की आवाज उससे बंधे हुए चैपाये के मन में पल भर के लिए ही क्यों न हो,