मेरा आजीवन कारावास - Mera Aajivan Karavas



दंड प्रारंभ हुए प्रायः एक महीना बीत गया था। मुझे अभी भी वही भोजन मिलता था जो कच्चे बंदी को दिया जाता है, अतः मुझे दूध भी मिलता था। मैं अभी अभी भोजन से निपटा ही था। इतने में हवलदार ने मुझे बाहर बुलाया और तभी सपरिटेंडेंट भी आया,’’ अपना बोरिया-बिस्तर उठा लो।’’ मैंने अपना बिस्तर उठाया। सोचा, यह क्या-कहीं अंदमान तो नहीं जा रहे हैं। द्वार के पास आया, वहां जेल की गाड़ी खड़ी थी। मैं। भीतर बैठ गया, गाड़ी बंद हो गई, इतनी कि बाहर का कुछ भी दिखाई नहीं दिख रहा था। न दिशा,


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दंड प्रारंभ हुए प्रायः एक महीना बीत गया था। मुझे अभी भी वही भोजन मिलता था जो कच्चे बंदी को दिया जाता है, अतः मुझे दूध भी मिलता था। मैं अभी अभी भोजन से निपटा ही था। इतने में हवलदार ने मुझे बाहर बुलाया और तभी सपरिटेंडेंट भी आया,’’ अपना बोरिया-बिस्तर उठा लो।’’ मैंने अपना बिस्तर उठाया। सोचा, यह क्या-कहीं अंदमान तो नहीं जा रहे हैं। द्वार के पास आया, वहां जेल की गाड़ी खड़ी थी। मैं। भीतर बैठ गया, गाड़ी बंद हो गई, इतनी कि बाहर का कुछ भी दिखाई नहीं दिख रहा था। न दिशा,


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