लाठी नियति ने अचानक छीन ली- दया आती। और वे वज्रनिश्चयी वीर- जिन्होंने मात्र सुनने के लिए भी दुस्सह यातनाएं झेलीं- पर ‘उफ’ तक नहीं किया, न ही मेरे विरूद्व एक शब्द कहा, और उन युवकों की सब यातनाओं का स्मरण होते ही मुझे इतना दुःख हुआ कि कुछ देर में मैं अपनी यातनाओं को ही भूल गया। पुनः सोचता, कहीं मैं पिछड़ तो नहीं गया? सबसे आगे रहकर सामने हो रहे कठोर-से कठोर आघातों को झेलने के लिए क्या मैं छाती तानकर आगे नहीं खड़ा रहा? तो फिर अब जो अटल,
लाठी नियति ने अचानक छीन ली- दया आती। और वे वज्रनिश्चयी वीर- जिन्होंने मात्र सुनने के लिए भी दुस्सह यातनाएं झेलीं- पर ‘उफ’ तक नहीं किया, न ही मेरे विरूद्व एक शब्द कहा, और उन युवकों की सब यातनाओं का स्मरण होते ही मुझे इतना दुःख हुआ कि कुछ देर में मैं अपनी यातनाओं को ही भूल गया। पुनः सोचता, कहीं मैं पिछड़ तो नहीं गया? सबसे आगे रहकर सामने हो रहे कठोर-से कठोर आघातों को झेलने के लिए क्या मैं छाती तानकर आगे नहीं खड़ा रहा? तो फिर अब जो अटल,