चन्द्रकान्ता - Chandrakanta

से नौगढ़ तक की खबर रखे और दोनों तरफ नुकसान पहुँचाने की नीयत करे।’

महाराज – ‘अच्छा जो चाहो करो, तुम्हारे आ जाने से बहुत कुछ ढाँढ़स हो गई नहीं तो बड़ी ही फिक्र लगी हुई थी।’

बद्रीनाथ – ‘अब मैं रुखसत होऊँगा। बहुत कुछ काम करना है।’

हरदयालसिंह – ‘क्या आप डेरे की तरफ नहीं जाएँगे?’

बद्रीनाथ – ‘कोई जरूरत नहीं, मैं पूरे बंदोबस्त से आया हूँ और जिधर जी चाहेगा चल दूँगा।’

कुछ रात जा चुकी थी, जब महाराज से विदा हो बद्रीनाथ, जालिम खाँ की टोह में रवाना हुए।


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से नौगढ़ तक की खबर रखे और दोनों तरफ नुकसान पहुँचाने की नीयत करे।’

महाराज – ‘अच्छा जो चाहो करो, तुम्हारे आ जाने से बहुत कुछ ढाँढ़स हो गई नहीं तो बड़ी ही फिक्र लगी हुई थी।’

बद्रीनाथ – ‘अब मैं रुखसत होऊँगा। बहुत कुछ काम करना है।’

हरदयालसिंह – ‘क्या आप डेरे की तरफ नहीं जाएँगे?’

बद्रीनाथ – ‘कोई जरूरत नहीं, मैं पूरे बंदोबस्त से आया हूँ और जिधर जी चाहेगा चल दूँगा।’

कुछ रात जा चुकी थी, जब महाराज से विदा हो बद्रीनाथ, जालिम खाँ की टोह में रवाना हुए।


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