वक्त कहने को था मगर यह समझ कर चुप हो रहा कि शायद इसमें भी तुम्हारा कोई मतलब हो।’
तेजसिंह – ‘जरूर ऐसा ही है।’
देवीसिंह – ‘क्यों उस्ताद, इसमें क्या मतलब है?’
तेजसिंह – ‘देखो मालूम ही हुआ जाता है।’
कुमार – ‘तो कहते क्यों नहीं, आखिर कब बतलाओगे?’
तेजसिंह – ‘हमने यह सोचा कि कहीं योगी जी हम लोगों से धोखा न करें कि खाने-पीने में बेहोशी की दवा मिला कर खिला दें, जब हम लोग बेहोश हो जाएँ तो उठवा कर खोह के बाहर रखवा दें और यहाँ आने का रास्ता बंद करवा दें,
वक्त कहने को था मगर यह समझ कर चुप हो रहा कि शायद इसमें भी तुम्हारा कोई मतलब हो।’
तेजसिंह – ‘जरूर ऐसा ही है।’
देवीसिंह – ‘क्यों उस्ताद, इसमें क्या मतलब है?’
तेजसिंह – ‘देखो मालूम ही हुआ जाता है।’
कुमार – ‘तो कहते क्यों नहीं, आखिर कब बतलाओगे?’
तेजसिंह – ‘हमने यह सोचा कि कहीं योगी जी हम लोगों से धोखा न करें कि खाने-पीने में बेहोशी की दवा मिला कर खिला दें, जब हम लोग बेहोश हो जाएँ तो उठवा कर खोह के बाहर रखवा दें और यहाँ आने का रास्ता बंद करवा दें,