गए थे और यहीं पर कुमारी चंद्रकांता की तस्वीर का दरबार देखा था मगर आज इस बाग को वैसा नहीं पाया, न तो वह रोशनी ही थी न उतने आदमी ही। हाँ, पाँच-सात औरतें इधर-उधर घूमती-फिरती दिखाई पड़ीं और दो-तीन पेड़ों के नीचे कुछ रोशनी भी थी जहाँ उसका होना जरूरी था।
शाम हो गई थी बल्कि कुछ अँधेरा भी हो चुका था। वह औरत इन लोगों को लिए उस कमरे की तरफ चली जहाँ कुमार ने तस्वीर का दरबार देखा था। रास्ते में कुमार सोचते जाते थे – ‘चाहे जो हो
गए थे और यहीं पर कुमारी चंद्रकांता की तस्वीर का दरबार देखा था मगर आज इस बाग को वैसा नहीं पाया, न तो वह रोशनी ही थी न उतने आदमी ही। हाँ, पाँच-सात औरतें इधर-उधर घूमती-फिरती दिखाई पड़ीं और दो-तीन पेड़ों के नीचे कुछ रोशनी भी थी जहाँ उसका होना जरूरी था।
शाम हो गई थी बल्कि कुछ अँधेरा भी हो चुका था। वह औरत इन लोगों को लिए उस कमरे की तरफ चली जहाँ कुमार ने तस्वीर का दरबार देखा था। रास्ते में कुमार सोचते जाते थे – ‘चाहे जो हो