चन्द्रकान्ता - Chandrakanta



जालिम – ‘जो चाहो कहो मगर मैंने तुमको अपना उस्ताद मान लिया, जरा बद्रीनाथ की सूरत तो दिखा दो।’

आफत – ‘हाँ-हाँ देखो, धड़ तो उसका गाड़ दिया मगर सिर गठरी में बँधा है, लेकिन हाथ मत लगाना क्योंकि इसको मसाले से तर किया है जिससे कल तक सड़ न जाए।’

इतना कह आफत खाँ ने अपनी बगल वाली गठरी खोली जिसमें बद्रीनाथ का सिर बँधा हुआ था। कपड़ा खून से तर हो रहा था। जितने आदमी उसके साथियों में से उस जगह थे, बद्रीनाथ की खोपड़ी देख खुशी के मारे उछलने लगे।


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जालिम – ‘जो चाहो कहो मगर मैंने तुमको अपना उस्ताद मान लिया, जरा बद्रीनाथ की सूरत तो दिखा दो।’

आफत – ‘हाँ-हाँ देखो, धड़ तो उसका गाड़ दिया मगर सिर गठरी में बँधा है, लेकिन हाथ मत लगाना क्योंकि इसको मसाले से तर किया है जिससे कल तक सड़ न जाए।’

इतना कह आफत खाँ ने अपनी बगल वाली गठरी खोली जिसमें बद्रीनाथ का सिर बँधा हुआ था। कपड़ा खून से तर हो रहा था। जितने आदमी उसके साथियों में से उस जगह थे, बद्रीनाथ की खोपड़ी देख खुशी के मारे उछलने लगे।


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