दोनों सखियाँ अगल-बगल वाले दोनों पलँगों पर बैठ गई। पाठक, हम और आप भी एक तरफ चुपचाप खड़े हो कर इन तीनों की बातचीत सुनें।
वनकन्या – ‘ओफ, थकावट मालूम होती है।’
सब्ज कपड़े वाली सखी – ‘घूम कर क्या कम आए है?’
सुर्ख कपड़े वाली सखी – (दूसरी सखी से) ‘क्या तू भी थक गई है?’
सब्ज सखी – ‘मैं क्यों थकने लगी? दस-दस कोस का रोज चक्कर लगाती रही, तब तो थकी ही नहीं।’
सुर्ख सखी – ‘ओफ, उन दिनों भी कितना दौड़ना पड़ा था। कभी इधर तो कभी उधर, कभी जाओ तो कभी आओ।’
दोनों सखियाँ अगल-बगल वाले दोनों पलँगों पर बैठ गई। पाठक, हम और आप भी एक तरफ चुपचाप खड़े हो कर इन तीनों की बातचीत सुनें।
वनकन्या – ‘ओफ, थकावट मालूम होती है।’
सब्ज कपड़े वाली सखी – ‘घूम कर क्या कम आए है?’
सुर्ख कपड़े वाली सखी – (दूसरी सखी से) ‘क्या तू भी थक गई है?’
सब्ज सखी – ‘मैं क्यों थकने लगी? दस-दस कोस का रोज चक्कर लगाती रही, तब तो थकी ही नहीं।’
सुर्ख सखी – ‘ओफ, उन दिनों भी कितना दौड़ना पड़ा था। कभी इधर तो कभी उधर, कभी जाओ तो कभी आओ।’