कुमार – ‘(सूरज की तरफ देख कर) जी हाँ दिन तो… ।’
बाबा – ‘दिन तो क्या?’
कुमार – (सकपकाए-से हो कर) ‘देर तो जरूर कुछ हो गई, अब हुक्म हो तो जा कर अपने पिता और महाराज जयसिंह को जल्दी से ले आऊँ?’
बाबा – ‘हाँ जाओ, उन लोगों को यहाँ ले आओ। मगर मेरी तरफ से दोनों राजाओं को कह देना कि इस खोह के अंदर उन्हीं लोगों को अपने साथ लाएँ जो कुमारी चंद्रकांता को देख सकें या जिसके सामने वह हो सके।’
कुमार – ‘बहुत अच्छा।’
बाबा – ‘जाओ अब देर न करो।’
कुमार – ‘(सूरज की तरफ देख कर) जी हाँ दिन तो… ।’
बाबा – ‘दिन तो क्या?’
कुमार – (सकपकाए-से हो कर) ‘देर तो जरूर कुछ हो गई, अब हुक्म हो तो जा कर अपने पिता और महाराज जयसिंह को जल्दी से ले आऊँ?’
बाबा – ‘हाँ जाओ, उन लोगों को यहाँ ले आओ। मगर मेरी तरफ से दोनों राजाओं को कह देना कि इस खोह के अंदर उन्हीं लोगों को अपने साथ लाएँ जो कुमारी चंद्रकांता को देख सकें या जिसके सामने वह हो सके।’
कुमार – ‘बहुत अच्छा।’
बाबा – ‘जाओ अब देर न करो।’