चन्द्रकान्ता - Chandrakanta

इस वक्त तक सभी को रोते ही गुजरा !’’ दीवान साहब ने कहा, ‘‘अब तो सवेरा हो गया, भोजन क्या करूँ ? मैं थक भी गया हूँ, सोने को जी चाहता है।’’ यह कह कर पलंग पर जा लेटे, उनके दोस्त भी अपने घर चले गये।

सवेरे मामूल के मुताबिक वक्त पर दरबारी पोशाक पहन गुप्त रीति से ऐयार का बटुआ कमर में बांध दरबार की तरफ चले। दीवान साहब को देख रास्ते में बराबर दोपट्टी लोगों में हाथ उठने लगे, वह भी जरा-जरा सिर हिला सभी के सलामों का जवाब देते हुए कचहरी में पहुंचे। महाराज अब नहीं आये थे,


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इस वक्त तक सभी को रोते ही गुजरा !’’ दीवान साहब ने कहा, ‘‘अब तो सवेरा हो गया, भोजन क्या करूँ ? मैं थक भी गया हूँ, सोने को जी चाहता है।’’ यह कह कर पलंग पर जा लेटे, उनके दोस्त भी अपने घर चले गये।

सवेरे मामूल के मुताबिक वक्त पर दरबारी पोशाक पहन गुप्त रीति से ऐयार का बटुआ कमर में बांध दरबार की तरफ चले। दीवान साहब को देख रास्ते में बराबर दोपट्टी लोगों में हाथ उठने लगे, वह भी जरा-जरा सिर हिला सभी के सलामों का जवाब देते हुए कचहरी में पहुंचे। महाराज अब नहीं आये थे,


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