देवी-फिर आखिर हारा कौन यह भी तो कहो?
बद्री-कोई भी नहीं हारा।
कुमार-अच्छा यह तो कहो तुम छूटे कैसे!
बद्री-बस ईश्वर ने छुड़ा दिया, जानबूझ के कोई तरकीब नहीं की गई। पन्नालाल ने उसके सिर पर एक लकड़ी रखी, उस पत्थर के आदमी ने मुझको छोड़ लकड़ी पकड़ी बस मैं छूट गया। उसके हाथ में वह लकड़ी अभी तक मौजूद है।
कुमार-अच्छा हुआ, दोनों की ही बात रह गई।
बद्री-कुमार, मेरा जी तो चाहता है कि आपके साथ रहूं मगर क्या करूं, नमकहरामी नहीं कर सकता,
देवी-फिर आखिर हारा कौन यह भी तो कहो?
बद्री-कोई भी नहीं हारा।
कुमार-अच्छा यह तो कहो तुम छूटे कैसे!
बद्री-बस ईश्वर ने छुड़ा दिया, जानबूझ के कोई तरकीब नहीं की गई। पन्नालाल ने उसके सिर पर एक लकड़ी रखी, उस पत्थर के आदमी ने मुझको छोड़ लकड़ी पकड़ी बस मैं छूट गया। उसके हाथ में वह लकड़ी अभी तक मौजूद है।
कुमार-अच्छा हुआ, दोनों की ही बात रह गई।
बद्री-कुमार, मेरा जी तो चाहता है कि आपके साथ रहूं मगर क्या करूं, नमकहरामी नहीं कर सकता,