चन्द्रकान्ता - Chandrakanta



सुरेन्द्र : रानी के बदन से गहने उतरवा दिये यह अच्छा नहीं किया।

शिव : जब हम लोग जंगल में ही रहना चाहते हैं तो यह हत्या क्यों लिये जायें? क्या चोरों और डकौतों के हाथों से तकलीफ उठाने के लिए और रात भर सुख की नींद न सोने के लिए?

सुरेन्द्र : (उदासी से) देखो शिवदत्तसिंह, तुम हाल ही तक चुनार की गद्दी के मालिक थे, आज तुम्हारा इस तरह से जाना मुझे बुरा मालूम होता है। चाहे तुम हमारे दुश्मन थे, तो भी मुझको इस बेचारी तुम्हारी रानी पर दया आती है। मैंने तो तुम्हें छोड़ दिया,


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सुरेन्द्र : रानी के बदन से गहने उतरवा दिये यह अच्छा नहीं किया।

शिव : जब हम लोग जंगल में ही रहना चाहते हैं तो यह हत्या क्यों लिये जायें? क्या चोरों और डकौतों के हाथों से तकलीफ उठाने के लिए और रात भर सुख की नींद न सोने के लिए?

सुरेन्द्र : (उदासी से) देखो शिवदत्तसिंह, तुम हाल ही तक चुनार की गद्दी के मालिक थे, आज तुम्हारा इस तरह से जाना मुझे बुरा मालूम होता है। चाहे तुम हमारे दुश्मन थे, तो भी मुझको इस बेचारी तुम्हारी रानी पर दया आती है। मैंने तो तुम्हें छोड़ दिया,


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