चन्द्रकान्ता - Chandrakanta

चाहे जहां जाओ, मगर एक दफे फिर कहता हूं कि अगर तुम यहां रहना कबूल करो तो मेरे राज्य का कोई काम जो चाहो मैं खुशी से तुमको दूं, तुम यहीं रहो।

शिव : नहीं अब यहां न रहूंगा, मुझे छुट्टी दे दीजिये। इस मकान के चारों तरफ से पहरा हटा दीजिए, रात को जब मेरा जी चाहेगा चला जाऊंगा।

सुरेन्द्र : अच्छा, जैसी तुम्हारी मर्जी।

महाराज शिवदत्त के चारों ऐयार चुपचाप बैठे सब बातें सुन रहे थे। बात खत्म होने पर दोनों राजाओं के चुप हो होने के


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चाहे जहां जाओ, मगर एक दफे फिर कहता हूं कि अगर तुम यहां रहना कबूल करो तो मेरे राज्य का कोई काम जो चाहो मैं खुशी से तुमको दूं, तुम यहीं रहो।

शिव : नहीं अब यहां न रहूंगा, मुझे छुट्टी दे दीजिये। इस मकान के चारों तरफ से पहरा हटा दीजिए, रात को जब मेरा जी चाहेगा चला जाऊंगा।

सुरेन्द्र : अच्छा, जैसी तुम्हारी मर्जी।

महाराज शिवदत्त के चारों ऐयार चुपचाप बैठे सब बातें सुन रहे थे। बात खत्म होने पर दोनों राजाओं के चुप हो होने के


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