पंडितजी ने धमकी दी - मेरे घर में पाँव रखा, तो लातों से बात करूँगा।
सिलिया ने उद्दंडता से कहा - मुझे जहाँ वह रखेंगे, वहाँ रहूँगी। पेड़ तले रखें, चाहे महल में रखें।
मातादीन संज्ञाहीन-सा बैठा था। दोपहर होने को आ रहा था। धूप पत्तियों से छन-छन कर उसके चेहरे पर पड़ रही थी। माथे से पसीना टपक रहा था। पर वह मौन, निस्पंद बैठा हुआ था।
सहसा जैसे उसने होश में आ कर कहा - मेरे लिए अब क्या कहते हो दादा?
दातादीन ने उसके सिर पर
पंडितजी ने धमकी दी - मेरे घर में पाँव रखा, तो लातों से बात करूँगा।
सिलिया ने उद्दंडता से कहा - मुझे जहाँ वह रखेंगे, वहाँ रहूँगी। पेड़ तले रखें, चाहे महल में रखें।
मातादीन संज्ञाहीन-सा बैठा था। दोपहर होने को आ रहा था। धूप पत्तियों से छन-छन कर उसके चेहरे पर पड़ रही थी। माथे से पसीना टपक रहा था। पर वह मौन, निस्पंद बैठा हुआ था।
सहसा जैसे उसने होश में आ कर कहा - मेरे लिए अब क्या कहते हो दादा?
दातादीन ने उसके सिर पर