तब?'
'उनकी जैसी इच्छा।'
'तो तुम मुझे घर से निकाल दोगे?'
दातादीन ने पुत्र-स्नेह से विह्वल हो कर कहा - ऐसा कहीं हो सकता है, बेटा! धन जाय, धरम जाय, लोक-मरजाद जाय, पर तुम्हें नहीं छोड़ सकता।
मातादीन ने लकड़ी उठाई और बाप के पीछे-पीछे घर चला। सिलिया भी उठी और लँगड़ाती हुई उसके पीछे हो ली।
मातादीन ने पीछे फिर कर निर्मम स्वर में कहा - मेरे साथ मत आ। मेरा तुझसे कोई वास्ता नहीं। इतनी साँसत करवा के भी तेरा पेट नहीं भरता।
तब?'
'उनकी जैसी इच्छा।'
'तो तुम मुझे घर से निकाल दोगे?'
दातादीन ने पुत्र-स्नेह से विह्वल हो कर कहा - ऐसा कहीं हो सकता है, बेटा! धन जाय, धरम जाय, लोक-मरजाद जाय, पर तुम्हें नहीं छोड़ सकता।
मातादीन ने लकड़ी उठाई और बाप के पीछे-पीछे घर चला। सिलिया भी उठी और लँगड़ाती हुई उसके पीछे हो ली।
मातादीन ने पीछे फिर कर निर्मम स्वर में कहा - मेरे साथ मत आ। मेरा तुझसे कोई वास्ता नहीं। इतनी साँसत करवा के भी तेरा पेट नहीं भरता।