'सच कहती हो मालती?'
'तुम क्या समझते हो?'
'मैं! कभी बतलाऊँगा।'
पानी मेहता की गर्दन तक आ गया। कहीं अगला कदम उठाते ही सिर तक न आ जाए। मालती का हृदय धक-धक करने लगा। बोली - मेहता, ईश्वर के लिए अब आगे मत जाओ, नहीं, मैं पानी में कूद पडूँगी।
उस संकट में मालती को ईश्वर याद आया, जिसका वह मजाक उड़ाया करती थी। जानती थी, ईश्वर कहीं बैठा नहीं है, जो आ कर उन्हें उबार लेगा, लेकिन मन को जिस अवलंब और शक्ति की जरूरत थी, वह और कहाँ मिल सकती थी?
'सच कहती हो मालती?'
'तुम क्या समझते हो?'
'मैं! कभी बतलाऊँगा।'
पानी मेहता की गर्दन तक आ गया। कहीं अगला कदम उठाते ही सिर तक न आ जाए। मालती का हृदय धक-धक करने लगा। बोली - मेहता, ईश्वर के लिए अब आगे मत जाओ, नहीं, मैं पानी में कूद पडूँगी।
उस संकट में मालती को ईश्वर याद आया, जिसका वह मजाक उड़ाया करती थी। जानती थी, ईश्वर कहीं बैठा नहीं है, जो आ कर उन्हें उबार लेगा, लेकिन मन को जिस अवलंब और शक्ति की जरूरत थी, वह और कहाँ मिल सकती थी?