पानी कम होने लगा था। मालती ने प्रसन्न हो कर कहा - अब तुम मुझे उतार दो।
'नहीं-नहीं, चुपचाप बैठी रहो। कहीं आगे कोई गढ़ा मिल जाए।'
'तुम समझते होगे, यह कितनी स्वार्थिन है।'
'मुझे इसकी मजदूरी दे देना।'
मालती के मन में गुदगुदी हुई।
'क्या मजदूरी लोगे?'
'यही कि जब तुम्हारे जीवन में ऐसा ही कोई अवसर आए, तो मुझे बुला लेना।'
किनारे आ गए। मालती ने रेत पर अपने साड़ी का पानी निचोड़ा, जूते का पानी निकाला, मुँह-हाथ धोया,
पानी कम होने लगा था। मालती ने प्रसन्न हो कर कहा - अब तुम मुझे उतार दो।
'नहीं-नहीं, चुपचाप बैठी रहो। कहीं आगे कोई गढ़ा मिल जाए।'
'तुम समझते होगे, यह कितनी स्वार्थिन है।'
'मुझे इसकी मजदूरी दे देना।'
मालती के मन में गुदगुदी हुई।
'क्या मजदूरी लोगे?'
'यही कि जब तुम्हारे जीवन में ऐसा ही कोई अवसर आए, तो मुझे बुला लेना।'
किनारे आ गए। मालती ने रेत पर अपने साड़ी का पानी निचोड़ा, जूते का पानी निकाला, मुँह-हाथ धोया,