पंडित दातादीन की चौपाल आ गई। दारोगा जी एक चारपाई पर बैठ गए और बोले - तुम लोगों ने क्या निश्चय किया? रुपए निकालते हो या तलाशी करवाते हो?
दातादीन ने आपत्ति की - मगर हुजूर........
'मैं अगर-मगर कुछ नहीं सुनना चाहता।'
झिंगुरीसिंह ने साहस किया - सरकार, यह तो सरासर...
'मैं पंद्रह मिनट का समय देता हूँ। अगर इतनी देर में पूरे पचास रुपए न आए तो तुम चारों के घर की तलाशी होगी। और गंडासिंह को जानते हो? उसका मारा पानी भी नहीं माँगता।'
पंडित दातादीन की चौपाल आ गई। दारोगा जी एक चारपाई पर बैठ गए और बोले - तुम लोगों ने क्या निश्चय किया? रुपए निकालते हो या तलाशी करवाते हो?
दातादीन ने आपत्ति की - मगर हुजूर........
'मैं अगर-मगर कुछ नहीं सुनना चाहता।'
झिंगुरीसिंह ने साहस किया - सरकार, यह तो सरासर...
'मैं पंद्रह मिनट का समय देता हूँ। अगर इतनी देर में पूरे पचास रुपए न आए तो तुम चारों के घर की तलाशी होगी। और गंडासिंह को जानते हो? उसका मारा पानी भी नहीं माँगता।'